शकील बदायूंनी: जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में

शकील बदायूंनी: जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में

अपने हरदिल अजीज गीतों के लिये लगातार तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले शकील बदायूंनी की 3 अगस्‍त को जयंती है. दिल के अफसानों को दिल के लफ्जों में लिखने वाले शकील बदायूंनी के गीतों का जमाना दीवाना था. ऐसा कि वे जिस ट्रेन से सफर करते थे, उनसे मिलने वाले स्‍टेशन पर जमा हो जाया करते थे. संगीतकार नौशाद के साथ 25 से भी लंबे समय तक रिश्‍ता निभाने वाले शकील बदायूंनी आज जब नहीं है तब भी उनके गीत हमें हंसाते हैं, रूलाते हैं, हमारे दिल की बात करते हैं, हमसे बतियाते हैं. गीत हैं जो उनकी कमी पूरी करते हैं और गीत ही हैं जो उनका न होने का अहसास करवाते हैं. उनके बाद कई शायर आए और छाए मगर हमें उनकी कमी खलती है. ऐसे जैसे वे खुद कह गए हैं:

तेरे बगैर अजब दिल का आलम है
चराग सैकड़ों जलते हैं रोशनी कम है.

जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में
जी चाहता है मुंह भी ना देखूं बहार का.

उनके गीत क्‍या ही शानदार है कि फिल्‍मफेयर अवार्ड की हैट्रिक उनके नाम हुई.  उन्हें अपना पहला फि‍ल्मफेयर पुरस्कार वर्ष 1960 में प्रदर्शित ‘चौदहवी का चांद’ फि‍ल्म के गीत ‘चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो’ के लिए मिला था. अगले ही वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘घराना’ के गाने ‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं’ के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फि‍ल्म फेयर पुरस्कार पाया और तीसरे वर्ष 1962 में लगातार शकील बदायूंनी फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किए गए. गीत था ‘बीस साल बाद’ फिल्‍म का ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ .

3 अगस्त 1916 को उत्तर प्रदेश के शहर बदायूं से हुआ था. 20 अप्रैल 1970 को बीमारी के चलते गीतों के लिखने का यह कारवां थम गया मगर इन बीच के सालों में शकील बदायूंनी ने एक से बढ़ कर एक नायाब गीत रचे. फिल्‍मफेयर अवार्ड पाने वाले गीतों का जिक्र तो कर ही दिया है, इनके अलावा याद करूं तो जरा नजरों से कह दो जी निशाना चूक न जाए (बीस साल बाद), नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं (सन ऑफ इंडिया), गाए जा गीत मिलन के (मेला), सुहानी रात ढल चुकी (दुलारी), ओ दुनिया के रखवाले (बैजू बावरा), दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पडे़गा (मदर इंडिया), दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात (कोहिनूर), ना जाओ सइयां छुड़ा के बहियां (साहब बीबी और ग़ुलाम), नैन लड़ जइहें तो मन वा मा कसक होइबे करी (गंगा जमुना), ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे’ (मुगल-ए-आजम) जैसे गाने और दीदार, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुगल-ंए-आजम, गंगा-जमुना, मेरे महबूब, चौदहवीं का चांद, साहब बीवी और गुलाम जैसी फिल्‍में याद आती हैं.

कुछ अन्‍य गीतकारों की तरह ही शकील बदायूंनी भी फिल्‍मों में लिखने के पहले मंच पर अपनी शायरी का लोहा मनवा चुके थे. हर पिता की तरह शकील के वालिद भी बेटे को अफसर बनाना चाहते थे. इसके लिए बचपन से ही अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी की शिक्षा मिली. इसी पढ़ाई के दौरान करीबी रिश्तेदार मशहूर शायर जिया उल कादिरी उन्हें ट्यूशन पढ़ाते थे. उन्हीं के संग ने शकील को शायरी की तरफ मोड़ दिया. जब उच्च अध्‍ययन के लिए अलीगढ़ यूनिवर्सिटी गए तो वहां होने वाले मुशायरों ने उन्हें मंझे हुए शायर में बदल दिया. हालांकि, पिता की ख्‍वाहिश पूरी करते हुए वे 1942 से 46 तक दिल्ली में आपूर्ति विभाग में अफसर रहे लेकिन मुशायरों का दौर जारी रहा. इसी दौरान एक मुशारे में शिरकत करने जब वे 1946 में मुंबई गए तो उनकी मुलाकात संगीतकार नौशाद से हुई.

नौशाद ने ही शकील को निर्माता निर्देशक एआर कारदार से मिलवाया. तब शकील का अपना गीत ‘हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे’ सुनाया तो बात बन गई और फिल्‍म में लिखने का आमंत्रण मिल गया. इस तरफ फिल्‍मी गीतों का सफर फिल्‍म ‘दर्द’ से शुरू हुआ. इस फिल्‍म के लिए शकील बदायूंनी का लिखा पहला गीत ही बहुत चर्चित हुआ. यह गीत है, ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का, आंखों में रंग भरके तेरे इंतजार का’ और इसे उमादेवी ने गाया है. उमा देवी जिसे हम सब टुनटुन के नाम से जानते हैं.

गीतकार शकील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद की जोड़ी का यह सफर फिल्‍म ‘दर्द’ से शुरू हुआ जो अगले ढ़ाई दशक तक बना रहा. मोहम्‍मद रफी के आने के बाद यह जोड़ी तिकड़ी में बदल गई. तीनों ने मिल कर ऐसे कालजयी गीत रचे जो आज भी बेहद असरकारी हैं. खासकर दो गीत का जिक्र करना चाहूंगा. 1952 में प्रदर्शित हुई फिल्‍म ‘बैजू बावरा’ के लिए शकील ने लिखा ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ और संगीत दिया नौशाद ने. इसे गाया मोहम्‍मद रफी ने. यह श्रेष्‍ठ भजनों में गिना जाता है. शकील और नौशाद की जोड़ी के रचे ‘मदर इंडिया’ के गीत ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे बजा दे ज़रा बांसुरी’ के बिना होली का पर्व अधूरा लगता है.

शकील का दौर वह समय था जब साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, कैफी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे गीतकारों की अपनी राजनीतिक दृष्टि थी वहीं शकील केवल साहित्‍य रच रहे थे. एक तरफ मुशायरों का मंच था तो दूसरी तरफ फिल्‍मी गीत. उन्‍होंने साहित्‍य और लो‍कप्रिय लेखन के बीच एक प्रभावी संतुलन बना कर रखा. प्रकाश पंडित ने ‘शकील बदायूंनी और उनकी शायरी’ पुस्‍तक में शकील बदायूंनी का बयान दर्ज है:

मैंने, जहां तक संभव हो सका. अपनी शायरी को इस राह पर लाने की कोशिश की कि स्तर भी कायम रहे और सुनने वाले भी निराश न हों. कलाकार यदि प्रसिद्ध हो तभी उसकी आवाज में असर पैदा होता है और यह भी होता है कि कलाकार की आवाज जनता को अपनी ओर आकृष्ट करे. उसी प्रकार एक शायर यदि जनता में मान्य है तो उस शायर पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह अपने प्रभाव से जनता का स्तर ऊंचा करे, न कि उसको अधोस्थल की ओर ले जाए. जो हो, मुझे और मेरी गजलों को जिनती मान्यता मिलती गई. में उतना ही चौकन्ना होता गया.

कितनी की ही अच्‍छी बात कही है. सफलता, लोकप्रियता अपने साथ एक जिम्‍मेदारी लेकर आती है, नैतिक जिम्‍मेदारी. शकील बदायूंनी ने अपनी इस नैतिक जिम्‍मेदारी को न केवल समझा बल्कि पूरी ईमानदारी से निभाया भी. प्रकाश पंडित ने अपनी किताब में एक अनुभव कह सुनाया है. वे‍ लिखते हैं फ्रंटियर मेल मुंबई से फरटि भरती हुई दिल्ली की तरफ उड़ी जा रही है. लगभग हर छोटे-बड़े स्टेशन पर उसके रुकते ही प्लेटफार्म पर खड़े लोगों का समूह हड़बड़ाकर फर्स्ट क्लास के डिब्बों की ओर लपकता है और गाड़ी छूट जाने की बौखलाहट के बावजूद शीघ्र ही एक डिब्बे में काली शेरवानी और सफेद पायजामा पहने एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढ निकालता है जिसने सिर के बाल पीछे को संवार रखे हैं, जिसकी आंखों में बड़ी सुंदर चमक है और जिसके होटों पर सदाबहार मुस्कराहट मानो चिपक कर रह गई है. लोग बढ़-बढ़कर फूल-पान, मिठाइयां और फल उस व्यक्ति को भेंट करते हैं और वह सहर्ष स्वीकार करता जाता है.

डिब्बे में बैठे अन्य यात्री आश्चर्य से एक-दूसरे की ओर देखते हैं कि यह व्यक्ति न तो कोई जाना-माना नेता है, न अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कोई खिलाड़ी और फि‍ल्म अभिनेता तो हो ही नहीं सकता है. फिर इतना प्यार, हर जगह ऐसी आवभगत क्यों? शायद कुछ यात्री यह भी सोचते हों कि संभव है, इस व्यक्ति के कुल परिवार के लोग देश के हर नगर, हर कस्बे में मौजूद हों और यह किसी दूर देश की यात्रा को जा रहा हो. लेकिन किसी स्टेशन पर जब कोई उस व्यक्ति को उसके नाम से पुकारता है कि ‘शकील साहब! लौटते समय हमारे यहां अवश्य आइएगा, या शकील साहब! अगर संभव हो तो एक-आध दिन हमारे यहां रुक के चले जाइएगा तो रहस्य खुलता है कि वह व्यक्ति उर्दू का प्रसिद्ध गजल-गो शायर शकील बदायूनी है जो कहीं समुद्र पार नहीं, देश ही के किसी मुशायरे में शामिल होने जा रहा है; तथा वे लोग ‘शकील’ के कुटुंबी नहीं, उसके श्रद्धालु हैं.

हालांकि, कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह सब शकील बदायूंनी ही रचते थे. वे जहां भी यात्रा करते थे राह के शहरों में रहने वाले अपने प्रशंसकों को खबर कर देते थे और मुलाकात का इसरार करते थे. संभव है ऐसा हो भी और यह भी संभव है कि यह बात शकील की लोकप्रियता से ईर्ष्‍या करते हुए उड़ा दी गई हो. मगर हकीकत तो यह है कि शकील बदायूंनी के गीत हमारी दुनिया में शब्‍दों की मिठास घोले हुए हैं. हमारी जिंदगी का अक्‍स उनकी शायरी में नजर आता है. जैसे वे खुद कह गए हैं:

मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा, मोहब्बतों का हूं राजदां
मुझे फख्र है मेरी शायरी, मेरी जिंदगी से जुदा नहीं.

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