जादूगर का हाथ जला, राजस्‍थान में कमल खिला….दावों, योजनाओं की बहार फिर भी ढेर हुई कांग्रेस सरकार

जादूगर का हाथ जला, राजस्‍थान में कमल खिला….दावों, योजनाओं की बहार फिर भी ढेर हुई कांग्रेस सरकार

जयपुर.

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5 साल राजस्‍थान में कांग्रेस की सरकार…. मुख्यमंत्री एक बार फिर अशोक गहलोत…. कोरोना से जूझे….एक के बाद एक घोषणाओं और योजनाओं के दौर चले. सीएम गहलोत ने अपना जादू हर तरह से चलाने की कोशिश की, या कहें उन्होंने एक तरह से अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. सरकारी खजाने पर एक के बाद एक योजनाओं के जरिए महिला सशक्तिकरण और पिछड़े इलाकों के विकास के लिए जमीनी स्तर पर काम भी किया गया. लेकिन ये आखिर कहां कम रह गया जो राजस्‍थान में बीजेपी बहुमत के साथ आने को तैयार है. क्या कांग्रेस की अंदरूनी कलह ही पार्टी के लिए हार बन कर सामने आई या फिर राज्य की जनता को नए नेतृत्व की चाह थी. क्या बालकनाथ के नाम पर यूपी की तरह राजस्‍थान में भी योगी फैक्टर चला या वसुंधरा राजे पर एक बार फिर लोगों ने भरोसा जताया.

दरअसल, देखा जाए तो राजस्‍थान के नतीजे कुछ नए नहीं हैं. सही शब्दों में कहें तो लंबे समय से राजस्‍थान में ये परंपरा दिखी है कि कांग्रेस फिर बीजेपी, यानि एक टर्म कांग्रेस सरकार का तो दूसरा बीजेपी का. लेकिन इस बार बात कुछ अलग थी. गहलोत ने हर वर्ग के लिए अपने खजाने को खोल कर कुछ अलग तरह की जादूगरी दिखाने की कोशिश की लेकिन जादू फेल होता ही नजर आया. सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ देकर एक बड़े वर्ग को साधने के लिए सरकार के दांव को परफेक्ट समझना कहीं न कहीं बड़ी गलती रही. फिर महिला सशक्तिकरण के नाम पर चिराली और धन लक्ष्मी महिला समृधि केन्द्र जैसी योजनाओं का भी असर प्रदेश में नहीं हो सका. बड़ा तबका जिसको लेकर कांग्रेस आश्वस्त थी वही बीजेपी के साथ होता दिखा.

अब सवाल कि आखिर क्यों इतना सब करने के बाद भी कांग्रेस की हालत ऐसी हुई. दरअसल कांग्रेस की अंतर कलह से प्रदेश की जनता अघा गई. सचिन पायलट के सीएम बनने का सपना और गहलोत के कुर्सी बचाने का द्वंद इतना ज्यादा बढ़ा कि सरकार जनता को भूल इस झगड़े को सुलझाने में एक साल तक लगी रही. इसका सीधा फायदा बीजेपी को हुआ. इस दौरान बीजेपी के कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े से बड़ा नेता भी सड़कों पर उतर आई. जनता कोरोना से अभी उबरी नहीं थी और इसी को कांग्रेस के खिलाफ हथियार बना लिया. हालांकि बीजेपी की भी अंतर कलह तो सामने आई लेकिन पार्टी ने इसको काफी समझदारी के साथ निपटाया. वसुंधरा राजे के सीएम चेहरा बनाने को लेकर कई तरह की बातें रहीं लेकिन आखिर ये बात ही अचानक खत्म होती दिखी. दिया कुमारी और राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जैसे युवा चेहरे भी राजस्‍थान में पसंद बने.

चुनाव से कुछ समय पहले लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों ने भी कुछ हवा बीजेपी के पक्ष में बनाई. यहां पर कांग्रेस एक कदम पीछे दिखी और पार्टी के बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी लोगों को शायद अखर गई. हालांकि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने जमीनी स्तर पर काम करने की कोशिश की और कुछ बात भी बनती नजर आई लेकिन नाकाफी ही रही.

वहीं, समय की बात की जाए तो कांग्रेस ने कुल मिलाकर पांच साल में जनता के लिए योजनाओं के पिटारे को तो खोला लेकिन जनता के बीच नहीं पहुंच सकी. यहां गहलोत की जादूगरी नाकाम हो गई. यही समय था जिसका पूरा इस्तेमाल बीजेपी ने किया और लोगों के बीच न केवल प्रचार प्रसार के लिए पहुंची बल्कि उनकी समस्याओं को सुन अपने घोषणा पत्र को भी वैसा ही तैयार किया. जबकि कांग्रेस का घोषणा पत्र नए वादों की जगह पुरानी घोषणाओं का रटा रटाया लेख नजर आया. अंत में यही कि जादूगर का हाथ जला और प्रदेश में कमल खिला.

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